Thursday, July 13, 2017

Monday, July 10, 2017

Sunday, July 9, 2017

Maharaja Ranjit Singh Life History in Hindi शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह

Maharaja Ranjit Singh Life History in Hindi शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह


Maharaja Ranjit Singh Life History in Hindi

शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह


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महाराजा रणजीत सिंह (Maharaja Ranjit Singh) का नाम भारतीय इतिहास के सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है। पंजाब के इस महावीर नें अपने साहस और वीरता के दम पर कई भीषण युद्ध जीते थे। रणजीत सिंह के पिता सुकरचकिया मिसल के मुखिया थे। बचपन में रणजीत सिंह चेचक की बीमारी से ग्रस्त हो गये थे, उसी कारण उनकी बायीं आँख दृष्टिहीन हो गयी थी।






किशोरावस्था से ही चुनौतीयों का सामना करते आये रणजीत सिंह जब केवल 12 वर्ष के थे तब उनके पिताजी की मृत्यु (वर्ष 1792) हो गयी थी। खेलने -कूदने कीउम्र में ही नन्हें रणजीत सिंह को मिसल का सरदार बना दिया गया था, और उस ज़िम्मेदारी को उन्होने बखूबी निभाया।
महाराजा रणजीत सिंह स्वभाव से अत्यंत सरल व्यक्ति थे। महाराजा की उपाधि प्राप्त कर लेने के बाद भी रणजीत सिंह अपने दरबारियों के साथ भूमि पर बिराजमान होते थे। वह अपने उदार स्वभाव, न्यायप्रियता ओर समस्त धर्मों के प्रति समानता रखने की उच्च भावना के लिए प्रसिद्द थे। अपनी प्रजा के दुखों और तकलीफों को दूर करने के लिए वह हमेशा कार्यरत रहते थे। अपनी प्रजा की आर्थिक समृद्धि और उनकी रक्षा करना ही मानो उनका धर्म था।


महाराजा रणजीत सिंह नें लगभग 40 वर्ष शासन किया। अपने राज्य को उन्होने इस कदर शक्तिशाली और समृद्ध बनाया था कि उनके जीते जी  किसी आक्रमणकारी सेना की उनके साम्राज्य की और आँख उठा नें की हिम्मत नहीं होती थी।
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महाराजा रणजीत सिंह  के जीवन से जुड़े कुछ रोचक तथ्य /  Maharaja Ranjit Singh Interesting Facts in Hindi 

  • महा सिंह और राज कौर के पुत्र रणजीत सिंह दस साल की उम्र से ही घुड़सवारी, तलवारबाज़ी, एवं अन्य युद्ध कौशल में पारंगत हो गये। नन्ही उम्र में ही रणजीत सिंह अपने पिता महा सिंह के साथ अलग-अलग सैनिक अभियानों में जाने लगे थे।
  • महाराजा रणजीत सिंह को कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी, वह अनपढ़ थे।
  • अपने पराक्रम से विरोधियों को धूल चटा देने वाले रणजीत सिंह पर 13 साल की कोमल आयु में प्राण घातक हमला हुआ था। हमला करने वाले हशमत खां को किशोर रणजीत सिंह नें खुद ही मौत की नींद सुला दिया।
  • बाल्यकाल में चेचक रोग की पीड़ा, एक आँख गवाना, कम उम्र में पिता की मृत्यु का दुख, अचानक आया कार्यभार का बोझ, खुद पर हत्या का प्रयास इन सब कठिन प्रसंगों नें रणजीत सिंह को किसी मज़बूत फौलाद में तबदील कर दिया।



  • Maharaja Ranjit Singh का विवाह 16 वर्ष की आयु में महतबा कौर से हुआ था। उनकी सास का नाम सदा कौर था। सदा कौर की सलाह और प्रोत्साहन पा कर रणजीत सिंह नें रामगदिया पर आक्रमण किया था, परंतु उस युद्ध में वह सफलता प्राप्त नहीं कर सके थे।
  • उनके राज में कभी किसी अपराधी को मृत्यु दंड नहीं दिया गया था। रणजीत सिंह बड़े ही उदारवादी राजा थे, किसी राज्य को जीत कर भी वह अपने शत्रु को बदले में कुछ ना कुछ जागीर दे दिया करते थे ताकि वह अपना जीवन निर्वाह कर सके।
  • वो महाराजा रणजीत सिंह ही थे जिन्होंने हरमंदिर साहिब यानि गोल्डन टेम्पल का जीर्णोधार करवाया था।
  • उन्होंने कई शादियाँ की, कुछ लोग मानते हैं कि उनकी 20 शादियाँ हुई थीं।


  • महाराजा रणजीत सिंह न गौ मांस खाते थे ना ही अपने दरबारियों को इसकी आज्ञा देते थे।

लाहौर पर विजय

1798 ई. – 1799 ई  में अफगानिस्तान के शासक जमानशाह ने लाहौर पर आक्रमण कर दिया और बड़ी आसानी से उस पर अधिकार कर लिया पर अपने सौतेले भाई महमूद के विरोध के कारण जमानशाह को वापस काबुल लौट जाना ना पड़ा था| काबूल लौटते समय उसकी कुछ तोपें  झेलम नदी में गिर पड़ी थीं| रणजीत सिंह ने इन तोपों को नदी से निकलवा कर सुरक्षित काबुल भिजवा दिया | इस बात पर जमानशाह बहुत प्रसन्न हो गये और उन्होने रणजीत सिंह को लाहौर पर अधिकार कर लेने की अनुमति दे दी | इस के बाद तुरंत ही रणजीत सिंह ने लाहौर पर आक्रमण कर दिया और 7 जुलाई 1799 के दिन लाहौर पर आधिपत्य जमा लिया |

पंजाब के भिन्न-भिन्न मिसलों पर जीत हासिल की

  • ई॰ 1803 में अकालगढ़ पर विजय।
  • ई॰ 1804 में डांग तथा कसूर पर विजय।
  • ई॰ 1805 में अमृतसर पर विजय।
  • ई॰ 1809 में गुजरात पर विजय।



महाराजा रणजीत सिंह नें किया सतलज पार के प्रदेशो को अपने आधीन

  • ई 1806 में दोलाधी गाँव पर किया कब्जा।
  • ई॰ 1806 में ही लुधियाना पर जीत हासिल की।
  • ई॰ 1807 में जीरा बदनी और नारायणगढ़ पर जीत हासिल की।
  • ई॰ 1807 में ही फिरोज़पुर पर विजय प्राप्त की


अमृतसर की संधि 

महाराज रणजीत सिंह के सैनिक अभियानों से डर कर सतलज पार बसी हुई सिख रियासतों ने अंग्रेजो से संरक्षण देने की प्रार्थना की थी ताकि वह सब बचे रह सकें| तभी उन रियासतों की प्रार्थना पर गर्वनर जनरल लार्ड मिन्टो ने सर चार्ल्स मेटकाफ को रणजीत सिंह से संधि करने हेतु उनके वहाँ भेजा था| पहले तो रणजीतसिंह संधि प्रस्ताव पर सहमत नही हुए परंतु जब लार्ड मिन्टो ने मेटकाफ के साथ आक्टरलोनी के नेतृत्व में एक विशाल सैनिक टुकड़ी भेजी और उन्होंने अंग्रेज़ सैनिक शक्ति की धमकी दी तब रणजीतसिंह को समय की मांग के आगे झुकना पड़ा था।
अंत में चातुर्यपूर्वक महाराजा रणजीत सिंह नें तारीख 25 अप्रैल 1809 ईस्वी के दिन अंग्रेजो से संधि कर ली। इतिहास में यह संधि अमृतसर की संधि कही जाती है।

कांगड़ा पर विजय (ई॰ 1809)

अमरसिंह थापा नें ई॰ 1809 में कांगड़ा पर आक्रमण कर दिया था। उस समय वहाँ संसारचंद्र राजगद्दी पर थे। मुसीबत के समय उस वक्त संसारचंद्र नें रणजीतसिंह से मदद मांगी, तब उन्होने फौरन उनकी मदद के लिए एक विशाल सेना की रवाना कर दी, सिख सेना को सामने आता देख कर ही अमरसिंह थापा की हिम्मत जवाब दे गयी और वह सेना सहित उल्टे पाँव वहाँ से भाग निकले। इस प्रकार कांगड़ा राज्य पर भी रणजीत सिंह का आधिपत्य हो गया।

मुल्तान पर विजय (ई॰ 1818)




उस समय मुल्तान के शासक मुजफ्फरखा थे उन्होने सिख सेना का वीरतापूर्ण सामना किया था पर अंत में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। महाराजा रणजीत सिंह की और से वह युद्ध मिश्र दीवानचंद और खड्गसिंह नें लड़ा था और मुल्तान पर विजय प्राप्त की थी। इस तरह महाराजा रणजीत सिंह नें ई॰ 1818 में मुल्तान को अपने आधीन कर लिया।

कटक राज्य पर विजय (ई॰ 1813)

वर्ष 1813 में महाराजा रणजीत सिंह ने कूटनीति द्वारा काम लेते हुए कटक राज्य पर भी अधिकार कर लिया था | ऐसा कहा जाता है की उन्होंने कटक राज्य के गर्वनर जहादांद को एक लाख रूपये की राशि भेंट दे कर ई॰ 1813 में कटक पर अधिकार प्राप्त कर लिया था|

कश्मीर पर विजय (ई॰ 1819)

महाराजा रणजीत सिंह नें 1819 ई. में मिश्र दीवानचंद के नेतृत्व मे विशाल सेना कश्मीर की और आक्रमण करने भेजी थी। उस समय कश्मीर में अफगान शासक जब्बार खां का आधिपत्य था। उन्होनें रणजीत सिंह की भेजी हुई सिख सेना का पुरज़ोर मुकाबला किया परन्तु उन्हे पराजय का स्वाद ही चखना पड़ा। अब कश्मीर पर भी रणजीत सिंह का पूर्ण अधिकार हो गया था।

डेराजात की विजय (ई॰ 1820-21)

आगे बढ़ते हुए ई॰ 1820-21 में महाराजा रणजीत सिंह ने क्रमवार डेरागाजी खा, इस्माइलखा और बन्नू पर विजय हासिल कर के अपना अधिकार सिद्ध कर लिया था।

पेशावर की विजय (ई॰ 1823-24)

पेशावर पर जीत हासिल करने हेतु ई॰ 1823. में महाराजा रणजीत सिंह ने वहाँ एक विशाल सेना भेज दी। उस समय सिक्खों ने वहाँ जहांगीर और नौशहरा की लड़ाइयो में पठानों को करारी हार दी और पेशावर राज्य पर जीत प्राप्त कर ली। महाराजा की अगवाई में ई॰ 1834 में पेशावर को पूर्ण सिक्ख साम्राज्य में सम्मलित कर लिया गया।




लद्दाख की विजय (ई॰ 1836)
ई॰ 1836 में महाराजा रणजीत सिंह के सिक्ख सेनापति जोरावर सिंह ने लद्दाख पर आक्रमण किया और लद्दाखी सेना को हरा कर के लद्दाख पर आधिपत्य हासिल कर लिया|

महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु


भारतीय इतिहास में अपनी जगह बनाने वाले प्रचंड पराक्रमी महाराजा रणजीत सिंह 58 साल की उम्र में सन 1839 में मृत्यु को प्राप्त हुए। उन्होने अपने अंतिम साँसे लाहौर में ली थी। सदियों बाद भी आज उन्हे अपने साहस और पराक्रम के लिए याद किया जाता है। सब से पहली सिख खालसा सेना संगठित करने का श्रेय भी महाराजा रणजीत सिंह को जाता है। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र महराजा खड़क सिंह ने उनकी गद्द्दी संभाली।

कोहिनूर हीरा

महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद ई॰ 1845 में अंग्रेजों नें सिखों पर आक्रमण किया। फिरोज़पुर की लड़ाई में सिख सेना के सेनापति लालसिंह नें अपनी सेना के साथ विश्वासघात किया और अपना मोर्चा छोड़ कर लाहौर चला गया। इसी समय में अंग्रेज़ो नें सिखों से कोहिनूर हीरा लूट लिया, और साथ-साथ कश्मीर राज्य और हज़ारा राज्य भी छीन लिया। कोहिनूर हीरा लंदन ले जया गया और वहाँ ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया के ताज में जड्वा दिया गया। ऐसा कहा जाता है की कोहिनूर हीरे को ब्रिटेन की महारानी के ताज में लगाने से पहले जौहरीयों नें एक माह और आठ दिन तक तराशा था।

विशेष

महाराजा रणजीत सिंह में आदर्श राजा के सभी गुण मौजूद थे- बहादुरी, प्रजा प्रेम, करुणा, सहनशीलता, कुटिलता, चातुर्य और न्यायसंगतता। भारत वर्ष के इस महान तेजवंत शासक को हमारा आदर सहित प्रणाम।



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Saturday, July 8, 2017

Golden Temple history in Hindi |  स्वर्ण मंदिर इतिहास और रोचक बाते

Golden Temple history in Hindi | स्वर्ण मंदिर इतिहास और रोचक बाते




   स्वर्ण मंदिर इतिहास और रोचक बाते | 
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स्वर्ण मंदिर – Golden Temple  हरमंदिर साहिब के नाम से भी जाना जाता है, और सिख धर्म का यह मुख्य देवस्थान भी है, जिसे देखकर दुनिया भर के लाखो लोग आकर्षित होते है, केवल सिख धर्म के लोग ही नही बल्कि दूसरे धर्मो के लोग भी इस मंदिर में आते है.
ऐसा एक सुन्दर गुरुद्वारा अमृतसर के बीच में स्थापित है, जहा आज भी दुनिया भर से लाखो श्रद्धालु आते है. इस मंदिर का मुख्य केंद्र बिंदु इसपर सोने की परत चढ़ी होना है.
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स्वर्ण मंदिर का इतिहास और रचक बाते – Golden Temple History In Hindi

श्री हरमंदिर साहिब (देवस्थान) जिसे श्री दरबार साहिब और विशेष रूप से स्वर्ण मंदिर के नाम से जाना जाता है, यह सिख धर्म के लोगो का धार्मिक गुरुद्वारा है जिसे भारत के पंजाब में अमृतसर शहर में स्थापित किया गया है. स्वर्ण मंदिर अमृतसर की स्थापना 1574 में चौथे सिख गुरु रामदासजी ने की थी.



पाँचवे सिख गुरु अर्जुन ने हरमंदिर साहिब को डिज़ाइन किया और धार्मिक मान्यताओ के अनुसार हरमंदिर साहिब के अंदर सिख धर्म का प्राचीन इतिहास भी बताया गया है. हरमंदिर साहिब कॉम्पलेक्स अकाल तख़्त पर ही स्थापित किया गया है.
हरमंदिर साहिब को सिखो का देवस्थान भी कहा जाता है. हरमंदिर साहिब बनाने का मुख्य उद्देश्य पुरुष और महिलाओ के लिये एक ऐसी जगह को बनाना था जहा दोनों समान रूप से भगवान की आराधना कर सके. सिख महामानवों के अनुसार गुरु अर्जुन को मुस्लिम सूफी संत साई मियां मीर ने आमंत्रित किया था.
हरमंदिर साहिब में बने चार मुख्य द्वार सिखो की दूसरे धर्मो के प्रति सोच को दर्शाते है, उन चार दरवाजो का मतलब कोई भी, किसी भी धर्म का इंसान उस मंदिर में आ सकता है. वर्तमान में तक़रीबन 125000 से भी जादा लोग रोज़ स्वर्ण मंदिर में भक्ति-आराधना करने के उद्देश्य से आते है और सिख गुरुद्वारे के मुख्य प्रसाद ‘लंगर’ को ग्रहण करते है.
आज के गुरुद्वारे को 1764 में जस्सा सिंह अहलूवालिया ने दूसरे कुछ और सिक्खो के साथ मिलकर पुनर्निर्मित किया था. 19 वी शताब्दी के शुरू में ही महाराजा रणजीत सिंह ने पंजाब को बाहरी आक्रमणों से बचाया और साथ ही गुरूद्वारे के ऊपरी भाग को सोने से ढक दिया, और तभी से इस मंदिर की प्रसिद्धि को चार-चाँद लग गए थे.
अमृतसर स्वर्ण मंदिर का इतिहास – Golden Temple History Amritsar

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हरमंदिर साहिब और कुछ नही बल्कि भगवान का ही एक मंदिर है. गुरु अमर दास ने गुरु राम दास को एक अमृत टाँकी बनाने का आदेश दिया, ताकि सिख धर्म के लोग भी भगवान की आराधना कर सके. तभी गुरु राम दास ने सभी सिखो को अपने इस काम में शामिल कर लिया था. उनका कहना था की यह अमृत टाँकी ही भगवान का घर है. यह काम करते समय गुरु पहले जिस झोपडी में रहते थे उसे आज गुरु महल के नाम से भी जाना जाता है.




1578 CE में गुरु राम दास ने एक और टाँकी की खुदाई की, जिसे बाद में अमृतसर के नाम से जाना जाने लगा, और बाद में इसी टाँकी के नाम पर ही शहर का नाम भी अमृतसर रखा गया था. और हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) भी अमृतसर के बीचो-बीच बनाया गया था और इसी वजह से सभी सिख स्वर्ण मंदिर को ही अपना मुख्य देवस्थान मानते है.
केवल सिख धर्म गुरु ही नही बल्कि दूसरे धर्मगुरु भी सिखो के इस धर्मस्थान को मानते आये है जैसे की, बाबा फरीद और कबीर इसके साथ ही सिक्खो के पाँचवे गुरु, गुरु अर्जुन ने आदि ग्रन्थ की भी रचना वही रहते हुए की थी.
Tanaji ka history in hindi | तानाजी का इतिहास
स्वर्ण मंदिर के उत्सव –
सिखो का मुख्य उत्सव जिसे वहाँ मनाया जाता है वह है- बैसाखी जो अप्रैल माह के दूसरे सप्ताह में मनाया जाता है. इसी दिन सिख लोग खालसा की स्थापना का उत्सव भी मनाते है. सिखो के दूसरे महत्वपूर्ण दिनों में गुरु राम दास का जन्मदिन, गुरु तेग बहादुर का मृत्युदिन, सिख संस्थापक गुरु नानक देव का जन्मदिन इत्यादि शामिल है. इस दिन सिख लोग ईश्वर भक्ति करते है.
साधारणतः दीवाली के दिन दियो और कंदिलो की रौशनी में स्वर्ण मंदिर की सुंदरता देखने लायक होती है. इस दिन स्वर्ण मंदिर को दियो और लाइट से सजाया जाता है और फटाखे भी फोड़े जाते है. हर सिख अपनी ज़िन्दगी में एक बार जरूर स्वर्ण मंदिर जाता है और ज्यादातर सिख अपने ज़िन्दगी के विशेष दिनों जैसे जन्मदिन, शादी, त्यौहार इत्यादि समय स्वर्ण मंदिर जाते है.
स्वर्ण मंदिर सिखों का सबसे पवित्र स्थल माना जाता है। जिस तरह हिंदुओं के लिए अमरनाथ जी और मुस्लिमों के लिए काबा पवित्र है उसी तरह सिखों के लिए स्वर्ण मंदिर महत्त्व रखता है। सिक्खों के लिए स्वर्ण मंदिर बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसे "अथ सत तीरथ" के नाम से भी जाना जाता है। सिखों के पांचवें गुरु अर्जुनदेव जी ने स्वर्ण मंदिर (श्री हरिमंदिर साहिब) का निर्माण कार्य पंजाब के अमृतसर में शुरू कराया था। 

स्वर्ण मंदिर का इतिहास (History of Golden Temple) 
कहा जाता है कि हरिमंदिर साहिब का सपना तीसरे सिख गुरु अमर दास जी का था। लेकिन इसका मुख्य कार्य पांचवें सिख गुरु अर्जुनदेव जी ने शुरू कराया था। स्वर्ण मंदिर को धार्मिक एकता का भी स्वरूप माना जाता है। एक सिख तीर्थ होने के बावजूद हरिमंदिर साहिब जी यानि स्वर्ण मंदिर की नींव सूफी संत मियां मीर जी द्वारा रखी गई है। 



अमृतसर सरोवर की रचना (Sarovar at Golden Temple) 
स्वर्ण मंदिर के चारों तरफ एक सरोवर है जिसे अमृतसर सरोवर या अमृत सरोवर कहते हैं। इस सरोवर का निर्माण कार्य अर्जुनदेव जी ने पूरा कराया था। इस स्थान को बेहद महत्त्वपूर्ण और ऐतिहासिक माना जाता है।
स्वर्ण मंदिर के विशेष तथ्य (Important Facts of Golden Temple) 
• स्वर्ण मंदिर को सिखों का तीर्थ माना जाता है।
• पहली संपूर्ण गुरु ग्रंथ साहिब स्वर्ण मंदिर में ही स्थापित की गई है।
• बाबा बुड्ढा जी स्वर्ण मंदिर के पहले पूजारी थे।
• स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करने के चार द्वारा हैं।
• स्वर्ण मंदिर में दुनिया का सबसे बड़ा किचन है जहां प्रतिदिन करीब 1 लाख लोगों के लिए निशुल्क भोजन कराया जाता है। यह भोजन लंगर (एक सामूहिक भोज) के रूप में लोगों तक पहुंचता है।
• बैसाखी, लोहड़ी, प्रकाशोत्सव, शहीदी दिवस, संक्रांति जैसे त्यौहारों पर स्वर्ण मंदिर में भव्य कार्यक्रम होते हैं। विशेषकर खालसा पंथ की स्थापना दिवस यानि बैसाखी के दिन स्वर्ण मंदिर की अनुपम रूप देखने को मिलता है।

स्वर्ण मंदिर के नियम (Rules of Golden Temple) 
यूं तो स्वर्ण मंदिर में किसी भी जाति, धर्म के लोग जा सकते हैं लेकिन स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करते समय कुछ बुनियादी नियमों का अवश्य पालन करना होता है जो निम्न हैं: 




• मंदिर परिसर में जाने से पहले जूते बाहर निकालने होते हैं।
• मंदिर के अंदर धूम्रपान, मदिरा पान आदि पूर्णत: निषेध हैं।
• मंदिर के अंदर जाते समय सर ढंका होना चाहिए। मंदिर परिसर द्वारा सर ढंकने के लिए विशेष रूप से कपड़े या स्कार्फ प्रदान किए जाते हैं। सर ढकना आदर प्रकट करने का एक तरीका है।
• गुरुवाणी सुनने के लिए आपको दरबार साहिब के अंदर जमीन पर ही बैठना चाहिए।

स्वर्ण मंदिर की कुछ रोचक बाते – Interesting Facts About Golden Temple in Hindi
अपनी धार्मिक महत्वता होने के बावजूद स्वर्ण मंदिर के बारे में 10 और ऐसी बाते है जिन्हें जानना आपके लिये बहोत जरुरी है –

1. श्री हरमंदिर साहिब के नाम का अर्थ “भगवान का मंदिर” है और इस मंदिर में सभी जाती-धर्म के लोग बिना किसी भेदभाव के आते है और भगवान की भक्ति करते है.
2. इस मंदिर के बारे में एक और रोचक बात यह है की आप चारो दिशाओ से इस मंदिर में प्रवेश कर सकते हो क्योकि चारो दिशाओ में इस मंदिर के प्रवेश द्वार बने हुए है. और यह लोगों की एकता को दर्शाता है.



3. अमृत सरोवर के बिच में ही स्वर्ण मंदिर को बनाया गया है, अमृत सरोवर को सबसे पवित्र सरोवर भी माना जाता है.
4. गुरूद्वारे में सिख धर्म की प्राचीन ऐतिहासिक वस्तुओ का प्रदर्शन भी किया गया है, जिसे देश-विदेश से आये करोडो श्रद्धालु देखते है.
5. संरचनात्मक रूप से यह मंदिर जमीन की सतह से ज्यादा ऊपर नही बना है और यह हिन्दू मंदिरो के बिल्कुल विरुद्ध है, क्योकि हिन्दुओ के बहोत से मंदिर जमीन से थोड़े ऊँचे बने हुए होते है.
6. इस मंदिर को बार-बार कई बार उजाड़ा गया था, पहले मुघल और अफगानों ने और फिर भारतीय आर्मी और आतंकवादियो के मनमुटाव में. और इसी वजह से इसे सिख धर्म की विजय का प्रतिक भी माना जाता है.



7. स्वर्ण मंदिर का मुख्य हॉल गुरु ग्रन्थ साहिब का घर था.
8. कहा जाता है की स्वर्ण मंदिर आज एक वैश्विक धरोहर है, जहा देश ही नही बल्कि विदेशो से भी लोग आते है और इसकी लंगर सेवा भी दुनिया की सबसे बड़ी सेवा है, यहाँ 40000 से जादा लोग रोज़ सेवा करते है.


9. और इस मंदिर की सबसे रोचक और जानने योग्य बात यह है की यह मंदिर सफ़ेद मार्बल से बना हुआ है और जिसे असली सोने से ढका गया है और इसी वजह से इसे स्वर्ण मंदिर भी कहा जाता है.

Friday, July 7, 2017

जयपुर का शानदार जयगढ़ किला | Jaigarh Fort Jaipur History In Hindi

जयपुर का शानदार जयगढ़ किला | Jaigarh Fort Jaipur History In Hindi

जयपुर का शानदार जयगढ़ किला | Jaigarh Fort Jaipur History In Hindi



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जयगढ़ किला – Jaigarh Fort अरवल्ली रेंज के चील का टीला पर बना हुआ है. आमेर किले और मोटा सरोवर से इसे देखा जा सकता है, यह किला भारत के राजस्थान के जयपुर में आमेर के पास बना हुआ है. इस किले को 1726 में जय सिंह द्वितीय ने आमेर किले की सुरक्षा के लिये बनवाया था और इस किले के बनने के बाद ही इसका नाम रखा गया था.
इस किले को 


-box; color: blue;">आमेर किले के आकार में ही बनाया गया है, और Jaigarh Fort को भी विजयी किले के नाम से ही जाना जाता है. उत्तर-दक्षिण से इसकी लम्बाई 3 किलोमीटर (1.9 मीटर) और चौड़ाई 1 किलोमीटर (0.62 मीटर) है. इस किले को “जयवैन” के नाम से भी जाना जाता है, देखा जाये तो इस किले में दुनिया की सबसे बड़ी तोप भी बनी हुई है. महल के कॉम्प्लेक्स में लक्ष्मी विलास, ललित मंदिर, विलास मंदिर और आराम मंदिर भी बना हुआ है और एक हथियार ग्रह और म्यूजियम भी बना हुआ है. जयगढ़ किला और आमेर किला एक ही कॉम्प्लेक्स से जुड़ा हुआ है.

जयगढ़ किला का इतिहास – Jaigarh Fort Jaipur History In Hindi

प्राचीन समय में आमेर धुन्धर के नाम से जाना जाता था.
आमेर के किले का, प्राचीन राजा और मीनाओ के काल में डेटिंग के लिये उपयोग किया जाता था. और यही किला आज जयगढ़ किले के नाम से जाना जाता है. वास्तव में यह किला आमेर किले की सुरक्षा के लिये बनाया गया था. किले में स्थित सागर तालाब में पानी को इकट्टा करने की उचित व्यवस्था है. किले का निर्माण, सेना की सेवा के उद्देश्य से किया गया था जिसकी दीवारे लगभग 3 किमी. के क्षेत्र में फैली हुई है. किले के शीर्ष पर एक विशाल तोप रखी है जिसे जयवैन कहा जाता है. इस तोप का वजन 50 टन है.
इस तोप में 8 मीटर लम्बे बैरल रखने की सुविधा है जो दुनिया भर में पायी जाने वाली तोपों के बीच सबसे ज्यादा प्रसिद्ध तोप है. किले के सबसे ऊँचे पॉइंट पर दिया बुर्ज है जो लगभग सात मंजिलो पर स्थित है, यहाँ से पुरे शहर का मनोरम दृश्य दिखाई देता है.
जयगढ़ किला की कुछ रोचक बाते – Jaigarh Fort Interesting Facts
# जयगढ़ किले को विजय किले के रूप में भी जाना जाता है. यह जयपुर के विख्यात पर्यटन स्थलों में से एक है जो शहर से 15 किमी. की दुरी पर स्थित है. यह इगल्स के हील पर आमेर किले से 400 फूट की ऊंचाई पर स्थित है. इस किले के दो प्रवेश द्वार है जिन्हें दंगुर दरवाजा और अवानी दरवाजा कहा जाता है जो क्रमशः दक्षिण और पूर्व दिशाओ पर बने हुए है.
# जयगढ़ किला महाराजा जय सिंह ने 18वीं सदी में बनवाया था और यह शानदार किला जयपुर में अरावली की पहाडि़यों पर चील का टीला पर स्थित है. विद्याधर नाम के वास्तुकार ने इसका डिज़ाइन बनाया था और इस किले को जयपुर शहर की समृद्ध संस्कृति को दर्शाने के लिए बनवाया गया था. इस किले के उंचाई पर स्थित होने के कारण इससे पूरे जयपुर शहर को देखा जा सकता है. यह मुख्य रुप से राजाओं की आवासीय इमारत था लेकिन बाद में इसका इस्तेमाल शस्त्रागार के तौर किया जाने लगा. इतिहास और वास्तुकला जयगढ़ किले के पीछे एक समृद्ध इतिहास है. मुगल काल में जयगढ़ किला राजधानी से 150 मील दूर था और सामान की बहुतायत के कारण मुख्य तोप ढुलाई बन गया. यह हथियारों, गोला बारुद और युद्ध की अन्य जरुरी सामग्रियों के भंडार करने की जगह भी बन गया. इसकी देखरेख दारा शिकोह करते थे, लेकिन औरंगज़ेब से हारने के बाद यह किला जय सिंह के शासन में आ गया और उन्होंने इसका पुनर्निमाण करवाया. इस किले के इतिहास से जुड़ी एक और रोचक कहानी है.

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# लोककथाओं के अनुसार, शासकों ने इस किले की मिट्टी में एक बड़ा खजाना छुपाया था. हालांकि एैसे खजाने को कभी बरामद नहीं किया जा सका. पहाड़ की चोटी पर स्थित होने के कारण इस किले से जयपुर का मनोरम नज़ारा देखा जा सकता है. बनावट के हिसाब से यह किला बिलकुल अपने पड़ोसी किले आमेर किले के जैसा दिखता है जो कि इससे 400 मीटर नीचे स्थित है. विक्ट्री फोर्ट के नाम से भी प्रसिद्ध यह किला 3 किलोमीटर लंबा और 1 किलोमीटर चौड़ा है. इस किले की बाहरी दीवारें लाल बलुआ पत्थरों से बनी हैं और भीतरी लेआउट भी बहुत रोचक है. इसके केंद्र में एक खूबसूरत वर्गाकार बाग मौजूद है. इसमें बड़े बड़े दरबार और हॉल हैं जिनमें पर्देदार खिड़कियां हैं. इस किले में दुनिया की सबसे बड़ी तोप भी है. इस विशाल महल में लक्ष्मी विलास, विलास मंदिर, ललित मंदिर और अराम मंदिर हैं जो शासन के दौरान शाही परिवार रहने पर इस्तेमाल करते थे. दो पुराने मंदिरों के कारण इस किले का आकर्षण और बढ़ जाता है, जिसमें से एक 10वीं सदी का राम हरिहर मंदिर और 12वीं सदी का काल भैरव मंदिर है.



# बड़ी-बड़ी दीवारों के कारण यह किला हर ओर से अच्छी तरह सुरक्षित है. यहां एक शस्त्रागार और योद्धाओं के लिए एक हॉल के साथ एक संग्रहालय है जिसमें पुराने कपड़े, पांडुलिपियां, हथियार और राजपूतों की कलाकृतियां हैं. इसके मध्य में एक वाच टावर है जिससे आसपास का खूबसूरत नज़ारा दिखता है पास ही में स्थित आमेर किला जयगढ़ किले से एक गुप्त मार्ग के ज़रिए जुड़ा है. इसे आपातकाल में महिलाओं और बच्चों को निकालने के लिए बनाया गया था. आमेर किले में पानी की आपूर्ति के लिए इसके केंद्र में एक जलाशय भी है.
गुलाबी नगर जयपुर

गुलाबी नगर जयपुर

गुलाबी नगर जयपुर






  ऐतिहासिक पृष्ठभूमि




      Hawamahal, Jaipur
भारत के गुलाबी नगर के नाम से प्रसिद्ध जयपुर अपने बेजोड़ नगर नियोजन के लिए विश्वविख्यात है | इस शहर की स्थापना कछवाहा वंश के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने 18 नवम्बर, 1727 में की थी | इसके पूर्व कछवाहों की राजधानी आमेर थी | जयपुर अपने उत्कृष्ट वास्तुशिल्प एवं कलात्मक वैभव के लिए जाना जाता है | इसकी सुंदरता की तुलना पेरिस से, आकर्षण की तुलना बुडापेस्ट से तथा भव्यता की तुलना मास्को से की जाती है | जयपुर का निर्माण ज्योतिष और वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों के आधार पर किया गया |


                                                                                
इस शहर का वास्तुनियोजन पं. विद्याधर भट्ट ने किया था | उन्होंने शहर को नौ वर्गों के सिद्धान्त के आधार पर बसाने का फैसला किया | जयपुर के राजमार्ग ज्यामितिक सूत्रों और गणितीय सिद्धान्तों को ध्यान में रख कर बनाए गए | इन राजमार्गो के संगम एक नाम और आकार के चौराहों या चौपाड़ों पर होते हैं, जिनके बीच में फव्वारे लगे हुए हैं जो इन चौराहों को अनोखी सुन्दरता प्रदान करते हैं | शहर की मुख्य सड़क 108 फीट चौड़ी व अन्य सडकें 54' 26',13'-6" फीट चौड़ी हैं | इसी प्रकार सडक के दोनों ओर दुकानें भी निश्चित चौड़ाई की हैं , जिन पर पुता हुआ गाढ़ा गुलाबी रंग सारे नगर को सूर्योदय और सूर्यास्त के समय एक अनुपम गुलाबी आभा से भर देता है | जयपुर अपनी खुबसुरती एवं सुन्दर नियोजन के कारण ही अपने निर्माण से पर्यटकों का पसंदीदा शहर बन गया | इसीलिए तो एक प्रमुख ब्रिटिश वास्तुविद् सर ह्यूज कासन ने पीकिंग और वेनिस के साथ जयपुर को विश्व के तीन सबसे सुंदर नगरों में स्थान दिया | यह नगर अनोखी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर को अपने में संजोए आधुनिकता का भी बेमीसाल नमूना हैं |
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   जयपुर के पर्यटन स्थल

हवामहल 
जयपुर शहर के बीचों-बीच स्थित पचास फीट ऊंचे और एक फुट से भी कम चौडे हवामहल की निराली भव्य छवि के कारण यह जयपुर के व्यक्तिव और उसकी सुन्दरता का पर्याय बन गया है | इस भव्य, कलात्मक व सुन्दरता से परिपूर्ण भवन का निर्माण महाराजा प्रतापसिंह ने 1799 ई. में करवाया था | यह महल राधा व कृष्ण को समर्पित हैं | पांच मंजिलों वाला गोल व आगे निकले झरोखे एवं खिड़कियों की एकरुपता युक्त पिरामिड सदृश्य हवामहल भारत में स्थापत्य कला का एक अद्भुत उदाहरण है | इस महल का निर्माणइस प्रकार किया गया है कि इनकी खिड़कियों से लगातार तेज हवा आती रहती है | इस भवन के बारे में खास बात यह है कि छोट-छोटे जाली झरोखों वाली उन्नत दीवार से आठ इंच चौडी है, जिस पर पूरी पांच मंजिले खड़ी होना निर्माणकला की अपनी विशिष्टता है|
जन्तर-मन्तर




         Janter-Mantar"
        जन्तर-मन्तर
जन्तर-मन्तर का निर्माण जयपुर शहर की स्थापना के समय 1734 में कराया गया था | सवाई जयसिंह द्वारा बनाईगई इस वेधशाला का अन्तरराष्ट्रीय महत्त्व है | इसका निर्माण समय की जानकारी प्राप्त करने के लिए कराया गया था | देश में सबसे पहली वेधशाला दिल्ली में 1724 में बनवाई गई और उसके दस वर्ष बाद जयपुर में वेधशाला बनाई गई थी | जयपुर की वेधशाला सबसे विशाल और विख्यात है | इस वेधशाला में स्वयं जयसिंह द्वारा निर्मित आविष्कृत तीन यंत्र -सम्राट, जयप्रकाश और रामयंत्र प्रमुख हैं, जिनकी सामान्य शुद्धता आधुनिक वैज्ञानिकों को भी विस्मित करती है|
जलमहल
    JalMahal
        जलमहल
जयपुर-आमेर मार्ग पर जलमहल का निर्माण सवाई जयसिंह ने करवाया था | ईश्वर विलास महाकाव्य और दस्तूर कौमवार की सूचनानुसार सवाई जयसिंह ने जयपुर की जलापूर्ति के लिए गर्भावती नदी पर बांध बनवाकर मानसागर तालाब बनवाया था | कहा जाता है कि सवाई जयसिंह ने अश्वमेघ यज्ञ में आमंत्रित ब्राह्मणों के भोजन व विश्राम की व्यवस्था इसी जलमहल में कराई थी| जलमहल मध्यकालीन महलों की भांति मेहराबों, बुर्जों, छतरियों तथा सीढ़ीदार जीनों से बना दो मंजिला और वर्गाकार रुप में निर्मित है| इसकी ऊपरी मंजिल के चारों कोनों पर बुर्जों की छतरियां व बीच की बारादरियां संगमरमर के अठपहलू स्तम्भों पर आधारित है|
रामनिवास बाग 
जयपुर-आमेर मार्ग पर जलमहल का निर्माण सवाई जयसिंह ने करवाया था | ईश्वर विलास महाकाव्य और दस्तूर कौमवार की सूचनानुसार सवाई जयसिंह ने जयपुर की जलापूर्ति के लिए गर्भावती नदी पर बांध बनवाकर मानसागर तालाब बनवाया था | कहा जाता है कि सवाई जयसिंह ने अश्वमेघ यज्ञ में आमंत्रित ब्राह्मणों के भोजन व विश्राम की व्यवस्था इसी जलमहल में कराई थी | जलमहल मध्यकालीन महलों की भांति मेहराबों, बुर्जों, छतरियों तथा सीढ़ीदार जीनों से बना दो मंजिला और वर्गाकार रुप में निर्मित है | इसकी ऊपरी मंजिल के चारों कोनों पर बुर्जों की छतरियां व बीच की बारादरियां संगमरमर के अठपहलू स्तम्भों पर आधारित है|
रामनिवास बाग 
अजमेरी गेट से सांगानेरी गेट तक फैला रामनिवास बाग परकोटे से बाहर एक महत्त्वपूर्ण स्थल है | इसमें अजायबघर, जन्तुशाला, अल्बर्ट हाल है | रामनिवास बाग के लिए कहा जाता है कि इसका निर्माण अकाल राहत कार्यों के तहत 4 लाख रुपये की लागत से महाराजा सवाई रामसिंह ने कराया था|
अल्बर्ट हाल
          Albert Hall
        अल्बर्ट हाल

शहर की ह्रदय स्थली रामनिवास बाग के मध्य स्थित भारतीय व पारसी शैलीमें बनी यह इमारत शहर का प्रमुख पर्यटक स्थल है | प्रिन्स आव अल्बर्ट के आगमन व सम्मान में निर्मित इस भवन की आधारशिला 6 फरवरी, 1876 ई. को प्रिंस अल्बर्ट ने रखी व 21 फरवरी, 1887 ई. को तत्कालीन भारतीय गवर्नर जनरल के एजेन्ट सर एडवर्ड ब्रेडफर्ड ने उद् घाटन किया | वर्तमान में इस भवन को म्यूजियम का रुप दे दिया गया है | अल्बर्ट हाल ;देश की एकमात्र ऐसी इमारत है, जिसमें कई देशों की स्थापत्य शैली का समावेश देखने को मिलता है | इस इमारत में भारतीय व फारसी शैली के अलावा मुगल, बोरोक, बुद्धिस्ट, रिनेसा व गोथिक की स्थापत्य शैली का मिश्रण है | इमारत के वास्तुकार कर्नल एस. जैकब ने दुनिया के म्यूजियमों की जानकारी लेकर बनवाया था | इस भवन में प्रवेश करते हुए एक हाल है जिसमें जयपुर के राजाओं के चित्र व राजचिन्ह हैं | चारों तरफ भारतीय व विदेशी कला के नमूनों की प्रतिकृतियां व भित्ति चित्र हैं |
गैटोर 
नाहरगढ़ किले की तलहटी में जयपुर के दिवंगत राजाओं की छतरियां निर्मित हैं, इस स्थान को गैटोर कहते हैं | सबसे सुंदर छतरी जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह की है, जिसकी एक अनुकृति लंदन के केनसिंगल म्यूजियम में रखी गई है



गलता 
शहर की पूर्वी पहाड़ियों के बीच स्थित गलता एक प्रमुख तीर्थ स्थल है | गलता कुण्ड में निरंतर गौमुख से पानी बहता रहता है | यहां इस पहाड़ी की एक चोटी पर सूर्य का प्रसिद्ध मंदिर है | इस धार्मिक स्थल में अनेक स्नानागार हैं | ऐसी मान्यता है कि यह गालव ऋषि की तपोस्थली रहा है|
सिसोदिया रानी का महल एवं बाग 
सवाई जयसिंह [द्वितीय] की महारानी सिसोदियाजी ने सन् 1779 में इसका निर्माण कराया था | इस बाग में फव्वारे लगे हुए हैं तथा इसके ऊपरी भाग में महल बना हुआ है |
विद्याधर का बाग
जयपुर के मुख्य वास्तुविद् एवं नगर नियोजक के नाम से बनाया गया यह बाग, चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ हैं | इसमें फव्वारे और कुण्ड हैं|

   जयपुर के मंदिर


जयपुर में कई बड़े-बड़े मंदिर हैं | इनमें गोविन्द देवजी का मंदिर, नहर के गणेशजी, मोती डूंगरी गणेशजी का मंदिर, ताड़केश्वरजी का मंदिर,राम मंदिर, लक्ष्मी नारायणजी का मंदिर, चर्च, गुरुद्वारे, जामा मस्जिद हैं|
सांगानेर में 11 वीं शताब्दी के संघीजी का प्रसिद्ध जैन मंदिर है, जो संगमरमर की शिल्पकला का उत्कृष्ट नमूना है | इसे माउण्ट आबू स्थित दिलवाड़ा मंदिर के बाद दूसरा स्थान दिया जाता है |

  जयपुर से दूर विशेष स्थान

सांगानेर जयपुर के दक्षिण में 13 किलोमीटर दूर पंचायत समिति मुख्यालय सांगानेर कागज निर्माण के लिए प्रसिद्ध है |
जमवारामगढ़ जयपुर से 26 किलोमीटर दूर पूर्व की ओर जमवारामगढ़ बांध है, जो पिकनिक की दृष्टि से उपयोगी स्थल है | जयपुर शहर को इस बांध से पीने का पानी सप्लाई किया जाता है | इस झील का कुल क्षेत्रफल 16 वर्ग किलोमीटर है |
सांभर जयपुर से 94 किलोमीटर दूर सांभर उत्तरी भारत के चौहान राजाओं की प्रथम राजधानी थी | यहां की झील से तैयार नमक निर्यात किया जाता है |
बैराठ जयपुर-शाहपुरा-अलवर मार्ग पर स्थित बैराठ के लिए कहा जाता है कि यहां पाण्डवों ने अपना निर्वासित जीवन व्यतीत किया था | यहां आज भी ऐसे स्थल हैं, जो पुरानी यादों को ताजा कराते हैं |
आमेर जयपुर से 11 किलोमीटर दूर आमेर में स्थित आमेर के किले का निर्माण 16वीं शताब्दी में राजा मानिंसह ने करवाया था। हिंदू ओर मुगल आर्टिकेट का बेजोड़ नमूने इस किले को राजपूत राजा 16वीं शताब्दी से 1727 तक प्रयोग करते थे।




 निर्माण और व्यवसाय
जयपुर जिला लाख एवं हाथी दांत का काम, सांगानेरी एवं बगरु की छपाई, पीतल की नक्काशी, ब्लु पाटरी, रत्न व्यवसाय, संगमरमर की मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध हैं |
जवाहरात: जवाहरात के निर्माण और व्यवसाय में जयपुर का नाम विश्व प्रसिद्ध है | यहां की नगीनाकारी का काम भी प्रसिद्ध है | पीतल की नक्काशी, मीनाकारी के लिए भी यह शहर प्रसिद्ध है | यहां सगमरमर की मूर्तियां भी बनाई जाती हैं, जिनका देश-विदेश में निर्यात होता है | चंदन की लकड़ी के खिलौने और ब्ल्यू पाटरी के लिए भी जयपुर मशहूर है |

 मेले एवं पर्व

तीज, गणगौर, शीतलाष्टमी |

 जयपुर की चित्रकला

जयपुर की चित्रकला अपना एक विशेष स्थान रखती है | यहां के भवनों, मंदिरों, राजभवनों पर पाए जाने वाले भित्ति चित्रों की अपनी अलग शैली है | जो जयपुर शैली के नाम से जानी जाती है | इन चित्रों में हरे रंग का ज्यादा उपयोग होता है | चित्रों में पीपल, बड़, घोड़ा और मोर का अधिक चित्रण किया जाता है | अधिकांश चित्र रागमाला, बारहमासा, कृष्ण चरित्र एवं नायिका भेद के होते हैं |




   जयपुर के तेल डिपो लगी आग
जयपुर. आईओसी के तेल डिपो के टैंकरों में October 31, 2009 लगी आग से दस करोड़ लीटर (एक लाख किलोलीटर) तेल धुआं बनकर जल रहा है। इसकी कीमत अनुमानत: 700 करोड़ रुपए है। इस डिपो में छोटे-बड़े 12 टैंक हैं। आईओसी के जनरल मैनेजर गौतम बोस ने बताया कि ऐसी आग उन्होंने पिछले तीस सालों में भी नहीं देखी।

  जयपुर में 8 बम विस्फोट

राजस्थान की राजधानी जयपुर में मंगलवार, 13 May शाम को सिलसिलेवार हुए 8 बम धमाकों में विस्फोटक पदार्थ आरडीएक्स का इस्तेमाल किया गया था। लगभग 20 मिनटों के अंतराल पर पुराने जयपुर शहर के जौहरी बाज़ार, त्रिपोलिया बाज़ार, बड़ी चौपाल, छोटी चौपाल, मानस चौक, चाँद पोल और कोतवाली के पास हुए धमाकों ने इस शांत शहर को दहला कर रख दिया. इन धमाकों में 63 लोग मारे गए हैं और 200 से ज़्यादा घायल हुए हैं.
जयपुर के हवा महल का इतिहास – Jaipur Hawa Mahal History In Hindi

जयपुर के हवा महल का इतिहास – Jaipur Hawa Mahal History In Hindi

जयपुर के हवा महल का इतिहास – Jaipur Hawa Mahal History In Hindi


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हवा महल (Hawa Mahal) भारत के जयपुर शहर में स्थित एक महल है. इसका नाम हवा महल इसलिये रखा गया क्योकि महल में महिलाओ के लिये ऊँची दीवारे बनी हुई है ताकि वे आसानी से महल के बाहर हो रहे उत्सवो का अवलोकन कर सके और उन्हें देख सके. यह महल लाल और गुलाबी बलुआ पत्थरो से बना हुआ है, यह महल सिटी पैलेस के किनारे पर ही बना हुआ है.

हवा महल का इतिहास – Jaipur Hawa Mahal History In Hindi

इसका निर्माण 1799 में महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने करवाया था. हिन्दू भगवान कृष्णा के मुकुट के रूप में ही लाल चंद उस्ताद ने इसे डिज़ाइन कीया था. इस पाँच मंजिला ईमारत के बाहर समान आकर के शहद के छत्ते भी लगे हुए है और महल में 953 छोटी खिड़कियां भी है जिन्हें झरोखा कहा जाता है और इन झरोखो को बारीक़ कलाकृतियों से सजाया भी गया है. उस समय महिलाये चेहरे पर जाली ढककर ही बाहर निकला करती थी और दैनिक जीवन का अवलोकन करती थी, उस समय महिलाओ को चेहरे पर “परदा” ढकना अनिवार्य था. कहा जाता है की इन जालियों की मदद से उन्हें चेहरे को ठंडी हवा भी लगती थी और तपती धुप में भी उनका चेहरा ठंडा रहता था. पुरे 50 साल बाद 2006 में महल की मरम्मत की गयी, इस समय इस स्मारक का मूल्य तक़रीबन 4568 मिलियन रुपये बताया गया था. वहाँ के कॉर्पोरेट सेक्टर ने इस स्मारक की सुरक्षा का जिम्मा उठाया लेकिन बाद में भारत के यूनिट ट्रस्ट ने यह जिम्मा उठाया. हवा महल के प्रसिद्ध होने के बाद इसके कॉम्पलेक्स को भी विकसित किया गया था. पर्यटको को बहोत सी इतिहासिक चीजे हवा महल में देखने मिलती है. महल में एक और आकर्षित करने वाली बात दीवार के मुड़े हुए किनारे है. जयपुर में बने दूसरे स्मारकों की तरह ही यह महल भी लाल और गुलाबी रंग के पत्थरो से बना हुआ है.



हवा महल की रोचक बाते – Interesting facts about Hawa Mahal

1) बिना किसी आधार के बना यह महल विश्व का सबसे ऊँचा महल है.सामने की तरफ कोई प्रवेश द्वार नही है. यदि आपको अंदर जाना है तो आपको पिछले भाग से जाना होंगा.
3) हवा महल में कुल पाँच मंजिले है और आज भी यह महल सफलता से अपनी जगह पर 87 डिग्री के एंगल में खड़ा है.
4) हवा महल “पैलेस ऑफ़ विंड्स” के नाम से भी जाना जाता है.
5) हवा महल में कुल पाँच मंजिले है.
6) हवा महल में कुल 953 खिड़कियाँ है जो महल को ठंडा रखती है.



7) जयपुर के सभी शाही लोग ईस महल का उपयोग गर्मियों में आश्रयस्थल की तरह करते है.
8) हवा महल को लाल चंद उस्ताद ने डिज़ाइन किया था.

9) यह महल विशेषतः जयपुर की शाही महिलाओ के लिये बनवाया गया था.
10) इस महल को बनाने का उद्देश्य शाही महिलाओ को बाज़ार और महल के बाहर हो रहे उत्सवो को दिखाना था.
11) एक एकमात्र ऐसा महल है जो मिगल और राजपूत आर्किटेक्चरल स्टाइल में बना हुआ है.
12) यह महल बहोत से भारतीयो और अंतर्राष्ट्रीय फिल्मो का पसंदीदा शूटिंग स्पॉट बना हुआ है.
13) हवा महाल में ऊपरी मंजिल में जाने के लिए केवल ढालू रास्ता है, वहाँ ऊपर जाने के लिये कोई सीढ़ी नही बनी है.
14) महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने 1799 में हवा महल को बनवाया था.





15) इसकी पाँच मंजिले पिरामिड के आकार में बनी हुई है जो उसकी ऊँचे आधार से 50 फ़ीट बड़ी है.
16) हवा महल की भगवान श्री कृष्ण के राजमुकुट के आकार का बनाया गया है.





17) हवा महल के खिड़कियों की जाली चेहरे पर लगे परदे का काम करती थी.
18)  हवा महल गुलाबी और लाल रंग के पत्थरो से बनाया गया है.